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आत्मनिर्भर भारत और नवीन राष्ट्रीय नीति अभियान के तहत शासकीय गृहविज्ञान महाविद्यालय

होशंगाबाद- आज दिनॉंक 26.11.2020 का आत्मनिर्भर भारत और नवीन राष्ट्रीय नीति अभियान के तहत शासकीय गृहविज्ञान महाविद्यालय में मशरूम उत्पादन प्रषिक्षण प्रारंभ किया जा चुका है । विगत पॉंच वर्षो से यह प्रषिक्षण सतत् दिया जा रहा है । प्राचाय डॉ कामिनी जैन ने बताया कि मषरूम उत्पादन हेेत ुमहाविद्यालय में पालिथीन बैग प्रणाली का उपयोग किया जा रहा है इससे कम स्थान में अधिक उत्पादन किया जा सकता है । इसके उत्पादन के लिए किसी प्रकार की विशिष्ट तकनीकी ज्ञान की आवष्यकता नही होती है । इसक उत्पादन में कमरे की तैयारी, रासायनिक विधि द्वारा भूसा भिगोना, बीजभरना, प्रबंधन, तुडाई, संग्रहण एवं उपयोग इन चरणों में किया जाता है । मशरूम से विभिन्न प्रकार के व्यंजन जैसे कटलेट्स, नूडल्स, पकोड़ा, अचार, सूप ,पुलाव, विरयानी बनाई जा सकती है।
प्राचार्य ने बताया कि मशरूम की खेती से पर्यावरण का कोर्इ्र नुकसान नही होता। मशरूम उत्पादन के बाद बचा हुआ भूसा कार्बनिक खाद के रूप में उपयोग किया जा सकता है।भूमिहीन व्यक्तियो के लिये यह लाभदायी है । मशरूम उत्पादन स्वरोजगार के लिए बड़ा अवसर प्रदान करती है । महाविद्यालय में आगामी योजना मशरूम बीज का उत्पादन करना प्रस्तावित है जिसे महाविद्यालय मे प्रयोगशाला तैयार किया जाएगा। इस हेतु महाविद्यालय के शैक्षणिक स्टॉफ को प्रशिक्षित किया जावेगा । होषंगाबाद जिला कृषि प्रधान है । यहां कृषि फसलों का उत्पादन बहुतायत में होता है । इन कृषि फसलों के व्यर्थ अवषेष से पुआल, भूसा का उपयोग पशुओं को खिलाने के लिए किया जाता है । लेकिन गेंहू फसल के अवषिष्ट का कोई उपयोग नही है किसान इसे खेतों में ही जला देते है । आयस्टर मशरूम की खेती एक बहुत ही अच्छा साधन है जिससे कृषि अवशिष्टो का प्रयोग कर किसान अपने परिवार को पौष्टिक आहार दे सकते है।हमारे जिले की जलवायु इसकी खेती के लिए बहुत ही अनुकुल है तथा अपने आने वाले समय में इस जिले में भी इसके उत्पादन मे वृद्वि की बहुत संभावनाये हैं । मशरूम की लगभग 50 किस्में ऐसी है जिन्हें खाया जाता है । इन किस्मों में सबसें सामान्य मशरूम को ताजा या डिब्बाबंद करके बेंचा जाता है । इसमें सबसे अधिक मूल्यवान मोरेस वा गुच्छी मशरूम, आयस्टर मशरूम व ढि़गरी, ष्वेत मशरूम, धान पराली मशरूम आदि प्रजातियॉं है । भारत में पहली बार मशरूम को उगाने का प्रयत्न मशरूम अनुसंधान केन्द सोलन में सन् 1961 में किया गया । मशरूम पौष्टिक गुणों से युक्त हैं । मशरूम को सब्जी के रूप में बहुत पहले से खाया जाता था, परंतु इसकी पौष्टिकता के ज्ञान का पता अनुसंधान द्वारा चला हे कि इसमें बहुमूल्य प्रोटीन,खनिज लवण तथा खाद्योज जैसे पोषक तत्व पाये जाते हैं । मशरूम से प्राप्त प्रोटीन की पाचन शक्ति 60-70 प्रतिषत तक होती है जो पोधों से प्राप्त प्रोटीन से कही अधिक है । मशरूम में पर्याप्त मात्रा में कैल्ष्यिम, फास्फोरस, लोहा, तांबा,तथा पोटास पाए जाते हैं । जो कि हड्डी बनने तथा आखों की रोषनी के लिए बहुत आवष्यक है। इसके अतिरिक्त मशरूम की कुछ प्रजातियॉ ऐसी भी हैं, जिनका उपयोग विभिन्न प्रकार की बिमारियों के उपचार के लिए किया जाता हैं। फोम्स आफिसिनेलिस कब्ज को ठीक करने के लिए, लाईकापरडोन गाईगेन्टस को रक्तस्त्राव रोकने के लिए और पॉलीपोरस आफिसिनेलिस को (थोडी मात्रा में सेवन करने से) दस्त को रोकने के लिए प्रयोग किया जाता है। मशरूम उत्पादन प्रषिक्षण डॉ. रष्मि श्रीवास्तव, श्रीमती प्रीति ठाकुर और डॉ. रीना मालवीय के द्वारा सम्पन्न कराया जा रहा है। संस्था अरूण चौरे (तकनीषियन प्रदान संस्था सुखतवा) की आभारी है कि उनका सतत् सहयोग हमारे महाविद्यालय को मिलता रहता है। महाविद्यालय के तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी एवं छात्राएॅ प्रतिवर्ष प्रषिक्षण में शामिल होकर लाभांवित होते है। इस वर्ष भी शहर की महिलाओं में श्रीमती अर्पिता गुबरेले, श्रीमती अंजना दुबे, श्रीमती राषि दुबे, एवं एसएनजी स्कूल के शिक्षक अमरसिंह रघुवंशी प्रशिक्षण में शामिल हुए। प्रदीप गुप्ता की रिपोर्ट

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