जिसकी कभी मौत ना हो उस अमर आत्मा को जानने का प्रयास अवश्य करना चाहिए- पं. तिवारी

जिसकी कभी मौत ना हो उस अमर आत्मा को जानने का प्रयास अवश्य करना चाहिए- पं. तिवारी

बैतूल/शाहपुर। कैलाश पाटील

रविवार को ग्राम भयावाड़ी में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस में श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं मे पूतना की कथा सुनाई
वहीं पं.भगवती प्रसाद तिवारी ने कहा की संसार में मनुष्य कितनी भी धन, संपत्ति, पद, प्रतिष्ठा , वैभव, प्राप्त कर ले लेकिन मन , ह्दय कभी तृप्त नहीं हो सकता । क्योंकि मनुष्य का ह्रदय तो केवल परमात्मा को पाने के लिए बना है ।
संसार की किसी भी वस्तु ,पदार्थ, व्यक्ति से ये ह्रदय भरो, वह खाली ही रहेगा। क्योंकि हमारा ह्रदय इन चीजों से भरने के लिए नहीं बना है। मनुष्य जितना पाता है,उतना ही खाली समझ कर जीवन भर लगा रहता है फिर भी इच्छा पूरी नहीं होती है। उद्धार ,माखनलीला कालीयनाग, बकासुर , अघासुर आदि राक्षसों का अंत करके, ब्रह्मा जी का मोहभंग एवं देवराज इन्द्र का मान भंग कर गोवर्धन धारण कथा प्रसंग आध्यत्मिकता के साथ सुनाया। प्रत्येक मनुष्य अपने चारों ओर आशाओं का, उम्मीदो का इच्छाओं का एक जाल बुनता है और फंसता जाता है। जब आशाऐ टुटती है तो दुःखी होता है। फिर समझता है भगवान मुझ से नाराज़ है, भाग्य साथ नहीं दे रहा मेरी किस्मत अच्छी नहीं है लेकिन ये नहीं सोचते तुमने ईश्वर के अलावा कहीं भी आशा लगाई है तो निराशा तो मिलेगी। मनुष्य की आस ही त्रास बन जाती है। सब दुख, चिंता दूर हो जाए तो फिर मे भजन भक्ति , ध्यान , सत्संग करूंगा ये आपका भ्रम है। भजन भक्ति से मन प्रसन्न रहेगा सुखी रहेंगे यह बात सच्ची है।
इस दुनिया में हम कुछ लेकर आऐ भी नहीं और कुछ लेकर जा भी नहीं सकते लेकिन एक बात सही है आप कुछ देकर अवश्य जा सकते हो।
गले में सोना ,चांदी हार महंगा पहनोगे तो चोर की नजर पड़ेगी और गले मे तुलसी की माला पहनोगे तो परमात्मा की नजर पड़ेगी। यह सारा संसार परमात्मा का है सब कुछ उसी का है फिर भी अज्ञानतावश मनुष्य कह रहा मेरा मेरा कहता रहता है। ना ज़मीन मकान ,धन परिवार , यहां तक की अपना तो शरीर भी नहीं है यही सब रह जाएगा। केवल परमात्मा ही हमारा है ।
मृत्यु निश्चित है, हम सभी को हमेशा थोड़ी थोड़ी मृत्यु की तैयारी करते रहना चाहिए।क्षकभी भी कहीं भी , किसी की भी मृत्यु हो सकती है। हम सब जिस लोक में रहते हैं। इसे मृत्यु लोक कहते हैं। शुकदेव मुनि जी महाराज ने राजा परीक्षित को आत्मतत्व का बोध करा दिया था ।

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